प्राचीन काल से यह एक विवाद का विषय रहा है कि उपाय कारगर होते हैं या नहीं। वह लोग जो उपाय के महत्व की वकालत करते हैं, निश्चित रूप से धार्मिक आस्था की अवधारणा के महत्व को समझते हैं। धार्मिक आस्था या फेथ हीलिंग का हर धर्म में खास जिक्र किया गया है।
1. क्या ज्योतिष उपाय भाग्य बदल सकता है ?
भाग्य इतना बलशाली है कि भाग्य को बदल पाना कठिन है परंतु असंभव नहीं। भाग्य को बदलना जातक के हाथ में है या फिर भगवान के जो कि भाग्य का रचयिता है या फिर भगवान के अवतार या फिर वह जो भगवान के जैसा समर्थ है या जिस पर ईश्वर की विशेष कृपा हो या वह व्यक्ति जो ईश्वर जैसा सक्षम हो या वह जिसे खास शक्तियां तप करने से प्राप्त हुई हों।
सिद्ध गुरु व अवतार के आशीर्वाद से भक्तियोग, ध्यानयोग, हठयोग, मंत्रयोग, कुण्डलिनी योग, ब्रह्मचर्य व सही ढंग से श्री विद्योपासना से भी भाग्य को बदला जा सकता है एक सिद्ध गुरु या योगी अपने शिष्य को दीक्षा दे उसे साधना करने में सक्षम बनाता है।
एक शिष्य सफलता तभी प्राप्त कर सकता है जब वह एकाग्रता व कुशलता से दीक्षा ले पूर्व जन्म की साधना का भी एक महत्त्वपूर्ण योगदान होता है और फिर उसका भाग्य भी उसकी सहायता करता है। अतः जीवन के हर मौसम या हर पहलू पर भाग्य का एक महत्वपूर्ण योगदान रहता है चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसासिक यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि व्यक्ति प्रयास एवं कर्म करने के (चाहे वह बुरे कर्म हो या अच्छे हों) लिए स्वतंत्र है।
यदि व्यक्ति कड़े मानसिक अनुशासन के साथ अपनी आत्मा की आवाज को सुनता है व सच्चाई के रास्ते पर चलता हुआ अपने बुरे कर्मों पर विजय पा लेता है तो उसके भाग्य में अच्छे कर्म जुड़ते जाते हैं। व्यक्ति के पिछले जन्मों के संस्कारों के फलस्वरूप वह आस्तिक बनता है ।
हमारी ईश्वर में निष्ठा ही हमसे पूजा करवाती है। पूजा-अर्चना करने से हमारी विचारधारा पावन होती है तो हमारे सोचने समझने की शक्ति विकसित होती है। विकसित सोच हमारी विचारधारा को परिष्कृत करती है और हम आत्म संयम व ब्रह्मचर्य जीवन में प्रवेश करते हैं।
ब्रह्मचर्य और पुरुषार्थ की शक्ति से भाग्य को बदला जा सकता है। इसलिए हमारे समाज के हर वर्ग के लोग ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने में विश्वास रखते हैं। सारे ऋषि, मुनि, साधु, संन्यासी, संत एवं पैगंबर इसके महत्व को मानते हैं। मोहनदास कर्मचंद गांधी ने भी इसकी विशेष व्याख्या की है।
इसकी शक्ति से हम दूसरों का भाग्य भी बदल सकते हैं। इसकी शक्ति से परिपूर्ण व्यक्ति युग के भाग्य को भी बदल सकता है। व्यक्ति की सफलता इस बात पर निर्भर होती है कि वह ब्रह्मचर्य या तपस्या को कितने आत्म संयम से निभाता है तो यहां उनके प्रयासों को महत्व दिया जा रहा है और प्रयास ही कर्म है।

अतः हम ये कह सकते हैं कि हमारे कर्म हमारे भाग्य से कम महत्पूर्ण नहीं हैं। निष्कर्ष ये निकलता है कि उपाय करना भी कर्म है। बौद्ध धर्म में नम म्योहो रेन्गे क्यों का उच्चारण करने से भाग्य को बदला जा सकता है पर तात्विक तथ्य यह है कि अध्यात्म हर धर्म से ऊपर है एवं अध्यात्म व्यक्ति के भाग्य को बदलने में सहायक हो सकता है।
वासना व लालच आध्यात्मिक विकास के पथ पर सबसे बड़े अवरोधक हैं। हर व्यक्ति में अपनी आध्यात्मिक उन्नति की क्षमता होती है इसलिए हमें अपने आध्यात्मिक पथ को पुनर्जागृत व प्रोत्साहित करना चाहिए ।
2. उपाय कैसे प्रभाव डालते हैं ?
जब एक मरीज चिकित्सक के पास इलाज के लिए जाता है तो सबसे पहले चिकित्सक समस्या की तह तक पहुंचकर बीमारी का निदान करने हेतु दवाएं बताता है। यदि बीमारी चिरकालिक है तो चिकित्सक यह भी कह सकता है कि इस बीमारी का इलाज चिकित्सा शास्त्र में नहीं है।
इसी तरह यदि व्यक्ति को मृत्यु का भय हो तो उसकी कुण्डली के अनुसार उन परिस्थितियों में ज्योतिष विज्ञान के उपाय से जैसे महामृत्युंजय यज्ञ द्वारा आकस्मिक मृत्यु या दुर्घटना को रोका जा सकता है, परंतु यदि उस व्यक्ति के भाग्य में उतना ही जीना लिखा है तो उपाय व उपचार उसे नहीं बचा सकते और इस स्थिति में केवल ईश्वर ही उसकी रक्षा कर सकता है। सही कहा गया है कि-
औषधि मणि मंत्राणां ग्रह नक्षत्र तारिका । भाग्यकाले भवेत्सिद्धि अभाग्यम् निष्फलम भवेत् ।।
औषधि, मंत्र और रत्न समस्याओं व उन बीमारियों को कम करता है जो अशुभ ग्रह व नक्षत्रों के कारण होते हैं। यदि समय अनुकूल है तो ये उपाय सहायक सिद्ध होते हैं। यदि समय प्रतिकूल हो तो ये उपाय काम नहीं करते ।
3. विशेष उपाय
भाग्य को बदलने के लिए कई उपाय हैं जैसे- किसी विशेष समस्या का समाधान, किसी रोग का निवारण करन किसी कमजोर ग्रह को ताकत देना, जीवन को उत्तम बनाना और आध्यात्मिक एवं संसारिक क्षेत्र में सफलता पान । ये उपाय, ब्रह्मा, श्रीकृष्ण, महर्षि पराशर, महर्षि जैमिनी, दत्तात्रेय, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि वेदव्यास, शिवजी, हनुमान, देवऋषि नारद, देवगुरु वृहस्पति, दैत्य गुरु शुक्राचार्य एवं कपिल आदि ऋषि, योगी, संत व पंडितजन द्वारा संस्तुत किए गए हैं।
4. चयन प्रक्रिया
एक श्रेष्ठ व प्रतिष्ठित ज्योतिषी को सही समय पर सही उपाय सही मुहूर्त में बताना चाहिए। मुहूर्त ज्योतिष का ज्ञाता ही सही मुहूर्त बता सकता है। उपाय का चयन दो बातों पर निर्भर करता है
उपाय करने वाले की जरूरत – एक व्यक्ति की कोई विशेष इच्छा, विशेष समस्या या रोग हो सकती है। और अगर उसे कोई ऐसा उपाय मिले जिससे उसे सहायता एवं राहत मिल सके तो वह अवश्य ही प्रसन्न होगा।
ज्योतिषीय आवश्यकता – यदि कोई ज्योतिषी कुण्डली में ग्रहों व दशाओं में कोई त्रुटि देखता है तो उसे जातक को इसके बारे में आगाह करना चाहिए व कुछ कारगर उपाय भी बताने चाहिए।
उपायों का चयन आखिरकार जातक की सहमति से मूलभूत सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। ये सिद्धांत ज्योतिषी की सहायता रत्नों, रुद्राक्ष, यंत्र, मंत्र, स्तोत्र माला एवं रहस्यमयी वस्तुएं जैसे ताबीज, लॉकेट, फेंगशुई, पिरामिड, सिक्का, शंख, अंगूठी, धातु रंग, जड़ी-बूटी, गंगाजल ये सारे उपाय स्वच्छंद रूप से बताए जा सकते हैं मगर यदि समस्या अधिक गंभीर हो तो जातक को यज्ञ करने की सलाह दी जा सकती है।
यदि कोई व्यक्ति कोई विशेष उपाय करने में असमर्थ है, तो उसे दूसरे उपाय बताए जा सकते हैं जो अधिक साध्य हैं। उपाय सामर्थ्य के अनुसार होते हैं।
एक उपयुक्त उपाय अपने इष्ट देवता या देवी की पूजा करना है या उस देवी वा देवता की आराधना करना जो किसी विशेष ग्रह के दोष या शुभ प्रभाव को नगण्य कर सके।
उदाहरण के लिए
- सूर्य के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए मातंगी देवी, विष्णु देवता या सूर्य देवता की पूजा करनी चाहिए,
- चंद्र के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए भुवनेश्वरी देवी या शिवजी का पूजन किया जाए,
- मंगल के दोष को कम करने के लिए बगलामुखी देवी, दुर्गा देवी, हनुमानजी, कार्तिकेय या नरसिंहजी की पूजा की जानी चाहिए।
- राहु के दोष को कम करने के लिए छिन्नमस्ता, दुर्गा या सरस्वती देवी,
- गुरु के लिए तारा देवी,
- शनि के लिए काली, शिवजी, भैरव व श्रीकृष्ण,
- बुध के लिए त्रिपुरसुंदरी देवी, त्रिपुर भैरवी या विष्णु भगवान और केतू के लिए धूमावति देवी की पूजा करनी चाहिए।
- लग्न को बली करने के लिए शास्त्रों में त्रिपुरभैरवी साधना का विधान वर्णित हैं।
इन देवी देवताओं की पूजा अर्चना भिन्न-भिन्न विधियों से की जाती है। जिनमें मंत्रोच्चारण, यज्ञ स्तोत्र व जप करना शामिल है।
5. ग्रहों की राशि से निर्धारित होता है कि किस तरह के उपाय प्रभावकारी होंगे ।
- यदि ग्रह की राशि अग्नि तत्व है तो यज्ञ व व्रत से लाभ होगा।
- यदि ग्रह की राशि पृथ्वी तत्व है तो रत्न, यंत्र, धातु धारण करना और देव दर्शन करना चाहिए।
- यदि ग्रह की राशि वायु तत्व हो तो मंत्र जाप, कथा व पूजा लाभकारी साबित होगी।
- यदि वह जल तत्व राशी में हो, तो दान दक्षिणा व जल विसर्जन और औषधि स्नान प्रभावकारी होगा।
- यदि कुंडली में योगकारक ग्रह बलवान हो तो रत्न व यंत्र को धारण करना, पूजा करना, मंत्रों का उच्चारण करना सही उपाय है।
- यदि मारक ग्रह बलवान् है तो वस्तुओं का दान व जल विसर्जन किया जाना चाहिए या फिर इन ग्रहों को मंत्रोच्चारण व देव दर्शन के द्वारा शांत किया जा सकता है।
6. विभिन्न उपाय किस प्रकार काम करते हैं ?
ज्योतिष का ध्येय भविष्य के बारे में सही फलकथन देना होता है। पर इसकी सही उपयोगिता हमारी समस्याओं के उपायों में होती है। ज्योतिष अत्यधिक लाभदायक है क्योंकि इस ज्ञान की सहायता से हमें अपने भविष्य की अच्छी व बुरी घटनाओं के बारे में जानकारी मिलती है। किसी ने सही कहा है “समस्या के आने की पूर्व सूचना होने से हम पूरी तरह से उसका सामना करने को सजग व सतर्क हो सकते हैं।”
यदि हम किसी संभावित प्रतिकूल घटना के बारे में समय से पहले जान लें तो हम अपने को उस घटना का सामना करने या उसे टालने के लिए तैयार कर सकते हैं व अपनी सुरक्षा जरूरी उपायों द्वारा कर सकते हैं।
ज्योतिष ज्ञान हमें विभिन्न उपायों की जानकारी से अवगत कराता है जो कि हमें मुसीबतों व दुखों से बचाता है। ये उपाय ग्रहों को अनुकूल करते हुए शान्त जीवन व्यतीत करने में हमारी सहायता करते हैं। एक अच्छा ज्योतिषी हमारे जीवन की हर प्रकार की समस्याओं का निवारण करने में सक्षम होता है।
भारतीय ज्योतिष ने हमें उपाय बताए हैं जिनसे ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है तथा दुखों व तकलीफों से निवारण होता है। हिंदू देव परमेश्वर शिव को आशुतोष नाम से संबोधित कर एक विशेष स्थान दिया गया है।
प्रसिद्ध हिंदी धार्मिक महाकाव्य रामचरितमानस में शिव के बारे में कहा गया है कि केवल वही हमारा भाग्य बदल सकते हैं- “भावी मेटि सकहिं त्रिपुरारी”। शिव को प्रसन्न करने के कई उपाय हैं जैसे महारुद्राभिषेक पूजा व अर्चना शिव की विशेष कृपा व आशीर्वाद रुद्राक्ष धारण करने वालों पर होती है।
इसी तरह कहा गया है कि “कलि चण्डी विनायकौ” जिसका अर्थ है कि कलियुग में श्री गणपति व चण्डी देवि हमें तुरंत व असरदार फल प्रदान करते हैं। इसी कारण से जो लोग किसी अशुभ ग्रह के प्रभाव में है वो दुर्गासप्तशती का पाठ करते हैं। चण्डी हमें दरिद्रता, दुख, अवसाद, रोग व भय से मुक्ति दिलाती है। विशेष रूप से नवरात्रों के समय हर हिंदू परिवार चण्डी देवी की पूजा-अर्चना करता है। श्री गणपति अपने भक्तजनों की बाघाओं को दूर करके उन्हें ऋद्धि, सिद्धि व बुद्धि प्रदान करते हैं। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु तुल्य कष्ट, मृत्यु के भय, दुर्घटना या रोग के भय से ग्रसित हैं तो ऐसी स्थिति में महामृत्युंजय यज्ञ बताया जाता है।

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
हिन्दु ज्योतिष अतुलनीय है क्योंकि इसमें उपायों का एक सुविस्तृत शोध-प्रबंध ग्रहों के दोषों को कम करता है। उपायों की उपलब्धता विभिन्न व्यक्तियों की जरुरतों और उनके देश, समुदाय व भूमण्डल के अनुसार होती है। व्यक्ति विशेष की जरूरतों व रुचि की सुविधा के लिए पूर्ण विकसित उपाय उपलब्ध है।
7. विभिन्न उपायों के प्रभाव का संक्षिप्त विवरण
चमत्कार आलौकिक या अस्वाभाविक नहीं बल्कि यह कुछ अलग, बहुत स्वाभाविक लेकिन प्रकृति से परे होता है। चमत्कार एक रत्न की तरह स्वाभाविक है और उतना ही सच्चा है जितने कि हम, हमारी सांसें और सूर्य जैसा शक्तिशाली रत्नों के चमत्कार का अर्थ है शक्ति का विकल्प के परिवर्तन के लिए प्रयोग ।
अब हम समझ सकते हैं कि रत्नों में गुप्त शक्तियां, किरणपात व ऊर्जा होती है। विभिन्न प्रकार के रत्नों में विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएं होती है जो कि हमारे जीवन में बदलाव उत्पन्न करने में सक्षम हैं। हमारे रत्नों के कोष हमारी जिस तरह से सहायता करते हैं, उसी तरह रुद्राक्ष में विद्युत चुंबकीय गुण होते हैं जो शरीर क्रिया विज्ञान पर प्रभाव डालता है।
रुद्राक्ष कवच सबसे शक्तिशाली प्रतिकारक यंत्र होता है क्योंकि यह व्यक्ति के सकारात्मक गुणों में वृद्धि करता है और हर नकारात्मक पक्ष को मिटाता है।
यंत्र – यंत्रों में गूढ़ शक्तियां होती है और ये हमारी रक्षा एक कवच की तरह करते हैं।
मंत्र – मंत्रोच्चारण हमारे अंदर स्पंदन पैदा करता है और हमारे व्यक्तित्व व बुद्धि का विकास करता है। इसके पश्चात् मालाओं के प्रयोग विभिन्न मंत्रोच्चारण करने के विशेष उद्देश्य को प्राप्त करते हैं। ऋषि या द्रष्टा यह भी कहते हैं कि माला के 108 मनके हमें हर तरह की सिद्धि प्राप्त कराते हैं। किसी खास समस्या के समाधन के लिए हम रत्न, रुद्राक्ष, मंत्र, यंत्र, ताबीज, अंगूठी, लॉकेट, स्फटिक, या सिक्के का प्रयोग कर सकते हैं।
स्फटिक – हमारी प्रतिकूल स्पंदन से रक्षा करते हैं। यह प्रकाश और ऊर्जा का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह परिवर्तक व विस्तारक / वर्द्धक के रूप में विभिन्न ऊर्जाओं को जैव ऊर्जाओं में परिवर्तित करके हमारे शरीर तंत्र / शारीरिक संरचना को संतुलित व कोशिकीय, भावनात्मक, मस्तिष्कीय व आध्यात्मिक स्तर पर पुनः ऊर्जावन् बनाते हैं। पारद शिवलिंग की पूजा करके हमें शिवजी का आर्शीवाद तुरंत प्राप्त होता है क्योंकि पारद शिवलिंग की पूजा से हजार करोड़ शिवलिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है।
यह माना जाता है कि अंगूठियों का हमारे ऊपर रहस्यमयी प्रभाव होता है। जब रत्न हमारी उंगली को छूता है तो हमारे अंदर अनुकूल ऊर्जा का प्रवाह करता है जिसका सीधा प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर होता है चूंकि हमारी उंगलियों की स्नायु का संबंध सीधे मस्तिष्क से होता है।
पिरामिड – उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने से भूमि व भवन के ऊर्जा क्षेत्र को सकारात्मक बलशाली व जैव ऊर्जा में परिवर्तित करता है और व्यक्ति की जैव ऊर्जा को खाली करने के बजाय संपूर्ण करता है। अतः वह व्यक्ति थकान व तनाव न महसूस करते हुए अतिरिक्त ऊर्जावान होकर रोजमर्रा की जिंदगी के दवाबों व अपेक्षाओं का डटकर सामना कर पाता है।
सकारात्मक ऊर्जा स्रोत के अंतर्गत व्यक्ति बेहतर निद्रा व स्वस्थ एवं सतुंष्ट जीवन को प्राप्त करता है। ऐसे में व्यक्ति अधिक अच्छे से ध्यान लगा सकता है तथा उसकी तनाव, थकान व संक्रामक रोगों से मुक्ति हो जाती है।
रंग चिकित्सा – हमारे शरीर के ऊर्जा चक्रों को संतुलित करती है और उसमें वृद्धि करती है। यह हमारे शरीर के स्वतः स्वस्थ होने की क्षमता को प्रेरित करती है। रंग चिकित्सा रंगों के प्रयोग से चक्रों के ऊर्जा केंद्रों को पुनः संतुलित करती है।
यज्ञ – इस समग्र सृष्टि के क्रिया कलाप ‘यज्ञ’ रूपी धुरी के चारों ओर ही चल रहे हैं। ऋषियों ने “अयं यज्ञो विश्वस्य नाभिः ” (अथर्ववेद 1, 15, 14 ) कहकर यज्ञ को भुवन की इस जगत की सृष्टि का आधार बिंदु कहा है। स्वयं गीताकार योगिराज श्रीकृष्ण ने कहा है :-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्वष्ट कामधुक । ।
अर्थात्- “प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ कर्म के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।” यज्ञ भारतीय संस्कृति के मनीषी ऋषिगणों द्वारा सारी वसुन्धरा को दी गयी ऐसी महत्वपूर्ण देन है, जिसे सर्वाधिक फलदायी एवं पर्यावरण केंद्र (इको सिस्टम) के ठीक बने रहने का आधार माना जा सकता है।
प्राणायाम – हमारे ऋषियों ने जीवन-भर तपस्या के फल स्वरूप, संसार में वास्तविक सुख और शांति लाने के लिए योग विज्ञान का निर्माण किया था । योग साधना में प्राणायाम सर्वश्रेष्ठ है।
कहा जाता है कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का नाम योग है। प्राणायाम सांस को लेने और छोड़ने की प्रक्रिया है । प्रायः हम शरीर के रोगों का इलाज औषधियों द्वारा करते हैं। परंतु यह देखा गया है कि रोग, मात्र इन औषधियों से नष्ट नहीं होते। योग और प्राणायाम के अभ्यास से हम इन शारीरिक रोगों से मुक्त हो सकते हैं। प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से विचार केंद्रित होते हैं और इस से प्राप्त शक्ति मनुष्य के जीवन के लिए लाभदायक सिद्ध होती है।
प्राणायाम को सर्वश्रेष्ठ तप की संज्ञा भी दी गई है तथा इसकी साधना से पापों का नाश होता है तथा ईश्वर की प्राप्ति होती हैं प्राणायाम से कुंडलनी शक्ति को भी जागृत किया जा सकता है।
अर्घ्य – मनोवांछा पूरा करने के लिए देवताओं को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। यह प्रक्रिया सभी पूजा पद्धतियों का अभिन्न अंग है। जल ईश्वर को अत्यंत प्रिय है। इसलिए इसकी महिमा का वर्णन श्री मद्भगवद् गीता में भी मिलता है।
दान – दान पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग है पूजा के अन्य दो मुख्य अंग हैं जप व तप ।
देव दर्शन – देव दर्शन अर्थात् तीर्थ स्थल की यात्रा को सभी धर्मों में शुभ माना गया है। अलग-अलग लोगों को अलग-अलग मंदिरों में आस्था होती है। इसलिए वह लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मंदिरों की यात्रा करने में विश्वास रखते हैं।
व्रत – व्रत एक अटल निश्चय है जब तक मनुष्य कोई व्रत नहीं करता तब तक उसका मन इधर-उधर भटकता है। योग साधना के अनुसार भी यम और नियम पर बल दिया जाता है और ये दोनों ही व्रत हैं। व्रत धारी के मन में यह पूर्ण निश्चय होना ही चाहिए कि यदि इससे मेरी कोई तात्कालिक हानि हो रही हो तब भी में अपना व्रत भंग नहीं करूंगा।
भारतीय हिंदू संस्कृति में व्रत व पर्वों का अधिकाधिक महत्व रहा है। वास्तव में व्रत करना व रखना भी एक तप के समान ही है, हमारे पौराणिक धर्म ग्रंथों व हिंदू शास्त्रों में व्रतों की अत्यधिक महिमा बताई गई है, इसलिए आज व्रतों को समस्या निवारण का एक अचूक उपाय माना जाता है। इन व्रतों में एकादशी, महाशिव रात्रि नवरात्र, वट सावित्री, करवाचौथ, पूर्णिमा आदि को श्रेष्ठ माना जाता है।
औषधि स्नान – आयुर्वेद में आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से किए जाने वाले औषधि स्नान से स्वास्थ्य में सुधार होता है।
जल विसर्जन फूल, दीपक या देवी देवता की मूर्तियों को ईश्वर का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विसर्जित किया जाता है।
8. उपाय की अवधि
अधिकतर उपायों की अवधि 40 दिन की होती है प्रत्येक प्रकार की पूजा 40 से 43 दिन में शुभ परिणाम देना शुरु कर देते हैं। इसलिए इस प्रकार के धार्मिक कृत्यों को लगातार 43 दिनों तक किए जाने की परम्परा है यदि समस्या अधिक गंभीर हो तो इन कर्म कांडों का एक सुविधा जनक अंतराल के बाद पुनरावर्तन किया जाना चाहिए।
ऐसा माना जाता है कि रत्न, रुद्राक्ष व अन्य अमूल्य ताबीज 43 दिन के बाद अपना शुभ परिणाम देते हैं। इन 43 दिनों के दौरान इस विशेष ताबीज, यंत्र, रुद्राक्ष या रत्न से जुड़ी पूजा व मंत्र का नियमित रूप से अनुष्ठान होते रहना चाहिए।
9. ग्रहों से संबंधित उपाय
ग्रहों की शांति के लिए व शुभ फल की प्राप्ति के लिए ग्रहों से संबंधि दान किया जाता है यज्ञ, रत्न व रुद्राक्ष धारण करके भी ग्रहों के अशुभ प्रभाव को कम कर शुभ प्रभाव प्राप्त कर सकते हैं। विशेष रूप से ग्रहों से संबंधित देवी-देवताओं की पूजा मंत्र जाप एक निश्चित संख्या में करके अनुकूल परिणाम प्राप्त होते हैं।
यदि किसी जन्म पत्रिका में भाग्येश कमजोर हो तो उससे संबंधित रत्न रुद्राक्ष, मंत्र जाप या देवी-देवता के पूजन आदि से भाग्य को प्रबल किया जा सकता है। ग्रहों की अत्यधिक शुभता प्राप्त करने के लिए भी यह उपाय किए जा सकते हैं।
10. विशेष समय के लिए उपाय
जब किसी व्यक्ति को दशा अंतर्दशा गोचर या जन्मपत्रिका में अशुभ ग्रह शनि, मंगल, राहु से परेशानी हो रही हो या शनि की ढैय्या साढ़ेसाती का समय हो तो उस समय ग्रह की अनुकूलता के लिए उपाय के रूप में यज्ञ, मंत्र, जप, स्तोत्र, रत्न, रुद्राक्ष और व्रत करके अशुभ समय के कुप्रभाव को कम किया जा सकता है।
11. मनोवांछा पूर्ति के लिए उपाय
प्रत्येक मानव जीवन में मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए जैसे स्वास्थ्यलाभ, धन, ज्ञान व यश प्राप्ति आदि के लिए विशेष यज्ञ, मंत्र जप या व्रतों को करके पूर्ण किया जा सकता है।
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